जाने खुद से ही क्यों भाग रहा हु मै

जाने खुद से ही क्यों भाग रहा हु मै  

ढूंढ रहा था जो बरसो से, निकट ही है वो जाने कही

एक एहसास मात्र है जो , जैसे चिपके ही खड़ा हो पीछे कही

चाहा है पुरे दिल से जिससे, बस हाथ बढ़ा के पा लेना है अब उससे

फिर भी न जाने क्यों, मस्ती में गले लगा के नाचने की बजाये,

दुगुनी फुर्ती से पल्ली तरफ जाने खुद से ही क्यों भाग रहा हु मै

क्यों भाग रहा हु मै ऐसे

क्या है जिससे डर लग रहा है मुझे, क्या है जो रोक रहा है मुझे

शायद पा के उसको, ख़तम हो जायेंगे वो खुद से बनाये हुए सारे बहाने

वो बहाने जो बन चुके है आंतरिक हिस्सा मेरा, आदत सी पद गयी है जिनकी,

बैशाखियो की तरह जिनके सहारे, लड्खारता हुए जाने खुद से ही क्यों भाग रहा हु मै

अपने ही बहाने का वजूद ख़तम हो जायेगा, फिर कहा भाग पाउँगा खुद से,

फिर तो पूरा तन मन लगाना पड़ेगा उसकी तलाश में,

क्या इसीलिए एकदम निकट होते हुए भी,

नजाने क्यों थोडा डरा हुआ सा थोडा सहमा हुआ सा

जाने खुद से ही क्यों भाग रहा हु मै

GIST For the English speaking readers: I can sense it, its somewhere near. Have wanted it for so long but now that its near, instead of reaching out and embracing it, don’t know why am running away in the other direction. Its almost as if i am so used to the excuses that i am scared of letting them go for i know once i see it, the very basis of all the excuses which i make to myself to withhold myself from pursuing it would be gone. I will then have no choice but to embrace it and go after it. Is it because of this that i am afraid to face it and taking the easy way out by running away from it.

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